रोजगार हाल ही में मध्य भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री ने रोजगार सृजन में कमी को लेकर केंद्र सरकार का मजाक उड़ायाविपक्षी दलों के अन्य मुख्यमंत्री भी नियमित रूप से यह सवाल उठाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि मुख्यमंत्री होने के नाते अपने नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध कराना उनकी जिम्मेदारी है, जिन्होंने उन्हें चुना हैउनमें से अधिकतर अपने बजट भाषणों में रोजगार सृजन का जिक्र नहीं करतेवे मानते हैं कि मुफ्त की सुविधाएं और सब्सिडी देना उनकी आर्थिक नीतियों का प्रमुख उद्देश्य है। आज रोजगार सृजन के लिए आर्थिक विस्तार भारत की जरूरत है। इस समय (2019-20 में) हमारी जीडीपी 30 खरब डॉलर यानी 209. 8 लाख करोड़ रुपये की है। पचास खरब डॉलर के लक्ष्य तक पहंचने के लिए हमें औद्योगिक विस्तार और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन को प्राथमिकता देनी होगी। सवाल उठता है कि आखिर रोजगार सृजन के लिए कौन जिम्मेदार है-राज्य सरकारें या केंद्र! शोध बताते हैं कि राज्यों के पास काफी संसाधन हैं, बड़ा बजट है, और वे जिस आर्थिक इकाई पर शासन करते हैं, उस पर इनका अधिक प्रभाव पड़ता है, लेकिन अधिकांश राज्यों में रोजगार सृजन पर ध्यान नहीं दिया जाता है। आंकड़े बताते हैं कि कुल खर्च में राज्यों का खर्च 2015 में 70 फीसदी से ज्यादा था, जो 2018-19 में बढ़कर 75.5 फीसदी हो गया। ऐसे ही, कुल खर्च में केंद्र सरकार का हिस्सेदारी 2016 में 30 फीसदी थी, जो 2019 में तेजी से घटकर 24.5 फीसदी रह गई। जाहिर है, आवश्यक पूंजी के जरिये आर्थिक विस्तार और रोजगार सृजन को प्रभावित करने की केंद्र सरकार की क्षमता सीमित है। केंद्र सरकार की भूमिका भारतीय गणतंत्र के लिए कामकाजी माहौल बनाना है। इस संबंध में इसके कर्तव्य -सही नीतियां और नियम बनाना, कर इकट्ठा करना तथा उसे राज्यों के बीच बांटना, एक प्रभावी सैन्य व रक्षा व्यवस्था बनाए रखना, मुद्रा और विदेशी मामलों को प्रबंधित करना, कौशल विकास और बुनियादी ढांचा नेटवर्क का निर्माण करना आदि। इन आवश्यक कर्तव्यों से परे, आर्थिक विकास के पहिये को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र की खर्च करने की क्षमता लगातार घटती जा रही हैभारत में रोजगार सृजन हो रहा है, लेकिन अच्छे वेतन के साथ गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की संख्या बढ़नी चाहिए, जो नहीं है। इसके अलावा देश विभिन्न हिस्सों में रोजगार सृजन असमान रहा है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) भारत में रोजगार सृजन का बेहतर ढंग से प्रतिनिधित्व करता है। ईपीएफओ सितम्बर, 2017 पैदा की गई नई नौकरियों को दर्ज करता है और हर माह उसकी रिपोर्ट प्रकाशित करता है। मैंने पहले भी बताया था कि अकेले ईपीएफओ पर पंजीकृत करीब एक करोड़ रोजगार प्रति वर्ष भारत सृजित हो रहे हैंईपीएफओ ने हाल ही में अपनी कार्यप्रणाली को अपडेट किया है, लेकिन अभी तक राज्यवार आंकड़े को इस अद्यतन कार्यप्रणाली के साथ विश्लेषित नहीं किया गया हैबिना अद्यतन विधि के ईपीएफओ के नए ग्राहकों के आंकड़े को देखें, तो सितम्बर, 2017 से नवम्बर, 2019 के बीच 34.3 लाख नई नौकरियों साथ महाराष्ट्र औपचारिक रोजगार सृजन के मामले में सबसे शीर्ष पर है। 13.7 लाख नई नौकरियों के साथ कर्नाटक काफी नीचे दूसरे स्थान पर है और उसके बाद 12.86 लाख नई नौकरियों के साथ गुजरात तीसरे नम्बर है। सामान्य तौर पर सभी दक्षिण-पश्चिमी राज्य आंध्र प्रदेश के पिछड़ने के बावजूद नई नौकरियां पैदा कर रहे । देश के उत्तर-पूर्वी मध्य क्षेत्र में रोजगार सृजन विशेष रूप से कम है। राज्यों पर आर्थिक विस्तार की जिम्मेदारी क्यों? राज्यों के पास बड़े बजट हैं और वे गहरे प्रभाव और दीर्घकालिक विस्तार योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए इन निधियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। भूमि, बिजली, पानी और कई अन्य आवश्यक चीजों का आवंटन उन्हीं के हाथों में है। इन सुविधाओं को उद्योग में लगाकर उन्हें अपने राज्य में रोजगार सुनिश्चित करना होगासीमित बजट कारण केंद्र रोजगार पैदा नहीं कर सकता। केंद्र सरकार रोजगार सृजन के लिए पूरे देश के लिए साझा नीति लागू करेगी। लेकिन भारत विविधताओं से भरा देश है, जहां ऐसी साझा नीति वांछित परिणाम नहीं देगी। आर्थिक विकास दर और राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद जैसे संकेतक, उच्च शिक्षा के जरिये मानव पंजी का विकास, औपचारिक रोजगार के अवसर शहरीकरण व औद्योगिकीकरण, जनसंख्या वृद्धि दर आदि विभिन्न राज्यों के बीच अलग-अलग होती हैं। इसलिए राज्य सरकारों को इन आंकड़ों का उपयोग करके व उचित ढंग से निवेश करके अपने राज्य की जरूरतों को समझना चाहिए। दक्षिण-पश्चिमी राज्यों में सामान्य रूप से प्रति व्यक्ति जीडीपी उच्च है तथा उच्च शिक्षा व स्नातक में सकल नामांकन दर उच्च है, जिसके कारण काफी रोजगार पैदा होते हैं, जबकि आबादी कम है। इन राज्यों में शिक्षा विकास आर्थिक विस्तार, औद्योगिकीकरण और मानव पंजी विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया है. जिस कारण उत्तर भारत की तलना में यहां शिक्षित, उच्च आय वाले समदाय हैं। 42.74 करोड़ की संयक्त अनुमानित आबादी वाले दक्षिण-पश्चिमी राज्यों में सितम्बर 2017 नवम्बर, 2019 के बीच 60.8 लाख नए रोजगार का सजन हआ। इसी दौरान 68.97 करोड़ की संयुक्त अनुमानित आबादी वाले सूदाय हैं। 4274 करोड़ काला में सृजन हुआउत्तर-मध्य-पूर्वी क्षेत्र में मात्र 23.5 लाख नए रोजगार का सृजन हुआ।उत्तर-मध्य-पूर्वी क्षेत्र के राज्य सामान्य रूप से मानव पूजी विकास और अपनी अर्थव्यवस्था के विस्तार में विफल रहे। वहां उच्च शिक्षा व स्नातक में सकल नामांकन दर निम्न है। उत्तर प्रदेश या राजस्थान जैसे राज्यों में स्नातकों की संख्या ज्यादा है, लेकिन प्रति व्यक्ति जीडीपी कम है। साथ ही, स्नातकों के अनुकूल रोजगार सृजन का अभाव है। इन राज्यों में बड़ी युवा आबादी है, जिसे रोजगार चाहिए। गुणवत्तापूर्ण नौकरी के अभाव में वहां के लोग या तो अपने भाग्य को कोस रहे हैं या बेहतर अवसर की तलाश में दक्षिणी राज्यों का रुख कर रहे हैं। आंकड़े स्पष्ट बताते हैं कि ज्यादा विकसित राज्य में ज्यादा नौकरिया हैंअब समय आ गया है कि सभी राज्य सरकारें अपनी आर्थिक संस्थाओं की जिम्मेदारी उठाए और रोजगार सृजन के लिए जरूरी औद्योगिक व शहरी माहौल तैयार करें। दक्षिणी राज्यों का रुख कर रहे या बेहतर अवसर की तलाश में उठाए सभी राज्य सरकारें अपना नौकरियां हैंअब बताते हैं कि गार सृजन का आर्थिक साथा समय आ गयी
रोजगार सृजन किसकी जिम्मेदारी